क्यों सिर्फ ऑफिस जाने वाली ही ‘वर्किंग वुमन’ कहलाती हैं हाउसवाइफ नहीं?

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हाउसवाइफ

‘कामकाजी महिलाएं’ या ‘वर्किंग वुमन’ इन दोनों शब्दों को सुनकर आपके जेहन में कैसी महिला की छवि उभरती है, किचन में खाना बनाती महिला या कंधे पर बैग लटकाए तेज रफ्तार से ऑफिस की सीढ़ियां चढ़ती महिला? ज़ाहिर है छवि दूसरी वाली ही बनती हैं, क्योंकि हमारे समाज में घर के काम की तो कोई अहमियत है ही नहीं और जब काम की ही अहमियत नहीं है तो उस काम को करने वाली महिला की भला क्यो होगी.

हद तो ये है कि हम महिलाएं खुद भी बड़ी रूड हैं, ऑफिस में काम करने वाली महिलाएं कई बार खुद अपनी किसी रिश्तेदार जो हाउसवाइफ है के बारे में कमेंट करते हुए बड़े आराम से कह देती हैं,  ‘उसे करना ही क्या होता, पूरा दिन पर आराम से बैठी रहती है और टीवी सीरियल्स देखती रहती है महारानी की तरह.’ पुरुष एक बार ये बात कहे तो समझ भी आता है क्योंकि उन महानुभावों को घर के काम का अनुभव नहीं, मगर कम से कम किसी महिला को तो दूसरी महिला के बारे में ऐसे कमेंट नहीं करने चाहिए.

क्या कभी किसी ने सोचा है जिस हाउसवाइफ को अक्सर पति महोदय ये कहते हैं ‘तुम करती ही क्या हो दिनभर?’ वो असलियत में क्या-क्या करती है दिन भर. अगर आपने भी इस बारे में नहीं सोचा है तो ज़रा किसी दिन सुबह जल्दी उठकर और पूरे दिन अपनी मां कि दिनचर्या पर नज़र रखिए फिर आप कभी नहीं कह पाएंगे कि ‘तुम करती ही क्या हो दिनभर.’

सुबह 5 बजे घड़ी के अलार्म के साथ उठने वाली हाउसवाइफ सुबह उठकर बेडटी नहीं पीती, बल्कि बिस्तर से नीचे उतरते ही किचन का रुख करती है, क्योंकि उसे स्कूल जाने वाले अपने बच्चों औ पति के लिए टिफिन बनाना होता है, उनका ब्रेकफास्ट रेडी करना होता है वो भी उनकी पसंद के हिसाब से. फिर बूढ़े सास-ससुर के लिए अलग कुछ बनाओ. बच्चों और पति के घर से जाने के बाद बर्तन, कपड़े, झाड़ू-पोंछा और नहाने जैसे काम निपटाकर दोबारा किचन में जुट जाती है दोपहर का खाना बनाने के लिए। तब तक बच्चों के स्कूल से आने का समय हो जाता है फिर उन्हें खिलाने-पिलाने में बिज़ी. इस बीच न तो उसके ब्रेकफास्ट का टाइम फिक्स रहता है और न ही लंच का.

हाउसवाइफ

पति महोदय हर रोज़ उसके बिगडते फिगर पर ताने कसकर एक्सरसाइज़ की नसीहत दे डालते है, मगर क्या करे बेचारी जब भी एक्सराइज़ की सोचती है और करने बैठती है तब तक कोई न कोई आवाज़ लगा देता है. कभी सास को चाय चाहिए तो कभी ससुर जी को दवाई कितनी बार कोशिश की है एकाग्र होकर योगा करने की, मगर नहीं घरवाले खुद अपना कोई काम कर ही नहीं सकते पानी ले लेकर खाना तक वो ही सबको निकालकर देती है.

शाम होते ही सबके लिए चाय और नाश्ता, फिर रात के खाने की तैयारी. रात को सबको खिला-पिलाकर किचन समेटते और सुबह की सब्ज़ी काटते बज जाते हैं 11. फिर भी लोग पूछते हैं तुम करती ही क्या हो?

ये सारे काम शायद दुनिया वालों की नज़र में भी बेकार है तभी तो कभी किसी ने हाउसवाइफ के लिए कामकाजी या वर्किंग वुमन शब्द का इस्तेमाल किया ही नहीं. वैसे भी पुरुषों को तो यही लगता है कि वो ऑफिस में सारा दिन काम करते हैं और उनकी हाउसवाइफ पत्नी आराम, अब कौन समझाए इन्हें कि जिस दिन वाकई पत्नी आराम करने लगेगी तो घर में आपको न तो एक सामान ही सही जगह पर मिलेगा और न ही टाइम पर आपका फेवरेट ब्रेकफास्ट और डिनर ही.