बच्चों में स्मार्टफोन एडिक्शन के 6 साइड इफेक्ट (6 Side effect of Smartphone addiction in kids)

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6 Side effect of Smartphone addiction in kids
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च्चा खाना नहीं खा रहा था, तो बहलाने के लिए आपने उसके हाथ में स्मार्टफोन थमा दिया. अब एक बार की ये आदत लत में बदल चुकी है, हर बार वो खाना से पहले फोन मांगता है और आप ये सोचकर उसे फोन थमा देती हैं, चलो इसी बहाने वो कुछ खा तो लेता है, मगर क्या आप जानती हैं कि ये स्मार्टफोन की लत बच्चों को मेंटली, सोशली और फिज़िकली बहुत नुक़सान पहुंचा सकती है.

 

क्रिएटिविटी ख़त्म हो जाती है

दिनभर मोबाइल में चिपके रहने पर बच्चे की ख़ुद की सोच विकसित नहीं हो पाती. कुछ नई चीज़ या आइडियाज़ उसके दिमाग़ में नहीं आता है. यहां तक कि उनका कॉन्संट्रेशन पावर भी कम हो जाता है और वो पढ़ाई पर भी ठीक से ध्यान नहीं दे पातें.

फिज़िकली एक्टिव नहीं रहते

शाम को जब सारे बच्चे ग्राउंड में खेल रहे होते हैं, आपका बच्चा मोबाइल पर किसी गेम में बिज़ी रहता है, इससे उसकी फिज़िकल ग्रोथ नहीं होती और वो एनर्जेटिक नहीं रहता है. साथ ही बाकी बच्चों के साथ नहीं खेलने पर वो सोशल भी नहीं बन पाता. बच्चों के लिए फिज़िकली एक्टिव होना और ख़ासतौर पर आउटडोर गेम्स बहुत ज़रूरी होता है, इससे शारीरिक विकास के साथ ही वो सोशल होना भी सीखते हैं.

पैरेंट्स से बॉन्डिंग होती है कमज़ोर

पैरेंट्स और बच्चों का रिश्ता मज़बूत हो इसके लिए ज़रूरी है कि पैरेंट्स बच्चों के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताएं, उनके साथ खेलें, बात करें, कभी-कभी उनकी तरह ही बच्चे बन जाएं, मगर आजकल के वर्किंग पैरेंट्स के पास इतना वक़्त नहीं होती, इसलिए अपनी कमी पूरी करने के लिए वो कम उम्र में ही बच्चे के हाथ में महंगा फोन थमाकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, मगर याद रखिए पैरेंट्स के प्यार और इमोशन की जगह ये गैजेट नहीं ले सकता, बल्कि उल्टा ये आके बच्चे को भी इमोशन लेस बना देगा. शायद आपने नोटिस किया होगा कि आजकल के ज़्यादातर बच्चें उम्र से पहले ही बड़ों जैसी बातें और बर्ताव करने लगते हैं, इसकी बहुत बड़ी वजह स्मार्टफोन है.

कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप नहीं हो पाती

फ्री टाइम मिलते ही घर के किसी कोने में स्मार्टफोन पर तेज़ी से उंगलियां फिराता आपका बच्चा वर्चुअल वर्ल्ड (मोबाइल) में तो गेम जीतकर विनर बन जाता है, मगर रियल लाइफ में लोगों से बात करने की  हिम्मत नहीं जुटा पाता. घर में दो-चार लोग जमा हो जाए, तो उनसे बात करना तो दूर वो अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकलता है. ये उम्र बच्चों की सीखने की होती है और इसी उम्र में अगर किसी गैजेट से चिपके रहेंगे तो उनमें कहां से इंसानी भावनाएं व गुण विकसित होंगे.

क्या कहती है रिसर्च?

ब्रिटेन में हुई एक स्टडी के मुताबिक, 11-12 साल के 70 फीसदी बच्चे  स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. वहीं 14 साल तक के क़रीब 90 प्रतिशत बच्चे स्मार्टफोन यूज़र हैं. एक अन्य स्टडी से पता चला है कि कि 10-13 साल के बच्चों के पास ख़ुद का स्मार्टफोन होता है. जिनमें से अधिकतर बच्चे दिन में कम से कम 150 बार स्क्रीन देखते हैं और इसी वजह से बच्चे गार्डन में दूसरे बच्चों के साथ खेलने और खिलौनों से खेलना भूलते जा रहे हैं. सुबह उठने के बाद सबसे पहले हो अपना स्मार्टफोन ही चेक करते हैं

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साइकोलॉजिकल असर

मोबाइल पर हिंसक गेम्स देखने व खेलने का असर उनके दिमाग़ पर भी होता है और उनके व्यवहार में भी हिंसा बढ़ जाती है. साथ ही स्मार्टफोन के रूप में आपने उन्हें जो दुनिया दे दी है, उसमें ढेर सारी ऐसी चीज़ें भी होती हैं, जो बच्चों के लिए ठीक नहीं है, मगर एक बार फोन देने के बाद आप ये डिसाइड नहीं कर पाएंगी कि वो क्या देखे और क्या नहीं.

ख़तरनाक होता है रेडिएशन

स्मार्टफोन से निकलने वाला रेडिएशन शरीर के साथ ही बच्चों के दिमाग़ के लिए भी ख़तरनाक होता है. जो पैरेंट्स ये सोचकर बच्चों को फोन थमा रहे हैं कि इससे बच्चे उनसे जुड़े रहेंगे और उन्हें उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं रहेगी, तो वे अलर्ट हो जाएं, क्योंकि स्मार्टफोन के जितने फ़ायदे हैं उससे ज़्यादा वो नुक़सानदायक है.

एक्स्पर्ट्स का मानना है कि बहुत छोटी उम्र में बच्चों को स्मार्टफोन नहीं देना चाहिए. 13-14 साल की उम्र में ये दें, मगर उसके इस्तेमाल की लीमिट भी तय करें. यदि बच्चों से कनेक्ट रहना चाहते हैं, तो उन्हें स्मार्टफोन की बजाय बेसिक फोन दें.

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